Saturday, 19 January 2019

बीता वक़्त………22, जुलाई ' 1990

पिछले तीन सालो से मेरी याद नहीं आई और आज पिता जी सीधे कॉलेज के हॉस्टल आ पहुंचे , वो भी बिना बताये, और साथ में दो अजीब से प्राणियों के साथ | पर इस अचानक उमड़े प्यार से मैं खुश न थी | मैं अपनी इस दुनिया में खुश थी जहा दोस्त थे जो मुझे समझते थे और एक वो था जो मुझे बहुत प्यार करता था | मुझसे न हो कर भी मेरे जैसा | पर आज पिता जी के अचानक ही प्रकट होने से लग रहा था की मेरी दुनिया मुझसे छिन जाने वाली थी | आज से चार साल पहले तक तो उन्हें मेरा मुँह देखना भी गवारा ना था , पर आज न जाने क्या हुआ ? उन दो प्राणियों में एक मेरी माँ भी थी, जो हमेशा चुप ही रहती थी | उस दिन भी चुप थी जब मेरी बड़ी बेहेन की मौत के बाद उसके ४० साल के पति से मेरा विवाह तय किया जा रहा था | दीदी की मौत उनके पांचवे बच्चे को जन्म देते हुए हुई थी और वो उस वक़्त सिर्फ २८ साल की थी | पर ये कोई विदेशी जोड़ा नहीं था , जो अपने प्यार की निशानिया अपनी ख़ुशी से पैदा किये जा रहा था , बल्कि यहाँ तो वही लड़के की चाह थी , जिसकी वजह से हम चार बहेनो के बाद पैदा हुआ हमारा छोटा भाई , जो आज सिर्फ ४ साल का हुआ है |

मैंने जब से होश संभाला, क्या बनना है ये तो पता नहीं था, पर क्या नहीं बनना है ये पता भी था और इसके लिए लड़ भी सकती थी | इसीलिए बारवी की परीक्षा के बाद इस खूबसूरत प्रस्ताव को ठुकरा कर घर को छोड़ दिया | ज़िन्दगी ने भी साथ दिया | बारवी में टॉप किया और दिल्ली यूनिवर्सिटी में भी नाम आ गया | फिर क्या था, सब भूल के और सब पीछे छोड़ के दिल्ली आ गयी | यहाँ आने के बाद तो लगा जैसे दुनिया ही बदल गयी | इंग्लिश होनोर्स में बी. ऐ. में दाखिला लिया और एक राह भी मिल गयी | सोचा लेखक बनूँगी और समाज में कुछ न बोल पाने वालो की आवाज़ | यहाँ पर मैं उससे भी मिली, जो मुझसे अलग हो कर भी मेरे जैसा था | वो कम बोलता था और कम हस्ता था, मेरी माँ की तरह, पर उसकी अपनी एक सोच थी, जिसके लिए वो समय आने पर समाज से लड़ भी सकता था | उसने मुझे लाइब्रेरी में घंटो किताबो के बीच बैठना, सिगग्रेट पीना, अपने विचारो को व्यक्त करना और किसी भी विषय पे तर्क करना सिखाया | हम घंटो बातें करते थे, समाज की, अलग अलग सोच की, देश विदेश की, अलग अलग संस्कृतियों की | हमने लिव इन में रहना भी शुरू कर दिया था | और शायद हम प्यार भी करते थे | मेरा खुशनुमा स्वाभाव और कुछ भी कर जाने की हिम्मत उसे बहुत पसंद थी |

पर आज मैं डर गयी थी | क्यों की आज पिता जी और मेरा १७ साल का बनारस के एक हिन्दू परिवार में बितायी ज़िन्दगी मेरे सामने खड़ी थी और मुझे उनसे अपने आज को मिलवाना था, फहद अंसारी को मिलवाना था |

7 comments:

  1. This is really beautiful... u have penned this awesomely... m eagrrly waiting for the next part....😍

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  2. Really good work. This is beautiful writing. Keep it up...

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  3. Nice Sam..u did a gr8 job...keep on writing like this...

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  4. Amazing article.. Very well brought the tragedy and dilemmas of being women in patriarchial society of India...

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  5. It seems like you can be an awesome writer one of the best waiting for the rest of the story

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