||| इच्छाएं
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बस बार बार एक ही ख्याल
मन को खाये जा रहा था , कि क्या अब मुझे भी अम्मा कि तरह चिकन मटन खाना मना हो जायेगा
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आज भी वो दिन याद है
मुझे जब दद्दा मेरे लिए लड़का देख रहे थे और
उनकी और मेरी एक ही शरत
थी कि लड़का वही चलेगा , जो चिकन मटन खाये और खाने दे|
उस जमाने में जहा लड़की
होना ही एक भार माना जाता था , जहाँ हर पर एक युध्य चलता रहता था जैसे उसे पढ़ाये या
नहीं और पढ़ाये तोह कितना , कि शादी के लिए लड़का मिले | वहाँ हमारी ऐसी शर्ते सुन कर
तोह सगेसम्बन्धी हस ही पड़ते थे | भाभी तोह
ताना भी मारा करती थी कि मिल चुका लड़का , अब तोह सारी जिंदगी के राशन का इंतेज़ाम करलो
, उस पे दद्दा ऊंची आवाज़ मे बोल पड़ते थे कि एक ही तोह शौकहै मेरी बहना का और अगर मै
उसका भी ध्यान ना दे पाया तोह या फायदा मेरे भाई होने का |
वैसे लड़का मिलने में
उतनी भी दिक्कत नहीं हुई और जब हमने सुना कि लड़के कि भी एक शरत है कि लड़की शादी के
बाद उनके साथ सहर जाये तोह दद्दा भी इस रिश्ते से फुले ना समाये |
बस फिर क्या था शादी एक बाद से आज तक जैसे भी दिन गुज़ारे
पर किसी के डर या दबाब से अपनी इच्छाएं नहीं मारी|
और आज पैसठ कि उम्र में
और जब वह मेरे सामने बेसुध पड़े थे तोह ना जाने मेरे भी मन में यह कैसे ख्याल आ रहे थे | सोच रही थी , यह समाज
कि कैसी रीथ है , जहा आदमी के मर जाने पे औरत
को कभी सती होना पड़ता था और आज भी अपनी साडी
इच्छाएं का तयाग करना पड़ता है |
तभी मेरे बड़े बेटे ने
आवाज़ दी , " समशान जाने कि सभी तैयारी हो गई है और कमरे में आया और मेरे कानमें
आ कर बोला , अम्मा पिता जी जाते वक़्त बोल गए थे , " सरिता कसम है तुजे , जो तूने
मेरे जाने के बाद चिकेन मटन खाना छोड़ा , सोच ले मेरी आत्मा भटकती रहेगी"|
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